Thursday 22 May 2008

आलोक श्रीवास्तव जयपुर में सम्मानित


आलोक श्रीवास्तव को सम्मानित करते
यशवंत व्यास,शिव कुमार शर्मा और आयोजक


बोलते आलोक


मंच पर एक नज़र

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२० मई की शाम को जयपुर के एम आई रोड स्थित चेंबर भवन में मूलत:विदिशा के रहने वाले और इनदिनों दिल्ली के बाशिंदे नामचीन युवा शायर आलोक श्रीवास्तव को डॉ भगवत शरण चतुर्वेदी फाउन्देशन की और से डॉ भगवत शरण चतुर्वेदी सम्मान से सम्मानित किया गया ,कार्य क्रम में प्रख्यात पत्रकार लेखक यशवंत व्यास ,शायर एवं न्यायाधीश शिव कुमार शर्मा ने आलोक को सम्मानित किया .

सम्मान के बाद वक्तव्य और ग़ज़ल पाठ में आलोक ने अपनी मशहूर ग़ज़लों - 'अम्मा' और 'बाबूजी' के साथ कुछ दोहे सुनाकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया . कार्यक्रम में लोकेश कुमार सिंह साहिल ,डॉ हरिराम आचार्य सहित शहर के अनेक प्रबुद्ध लेखक, शायर और पत्रकार थे

Saturday 17 May 2008

शिव कुमार बटालवी की एक तवील पंजाबी नज्म


एक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत

इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है
सूरत उसदी परियां वरगी
सीरत दी ओह मरियम लगदी
हसदी है तां फुल्ल झड़दे ने
तुरदी है तां ग़ज़ल है लगदी
लम्म सलम्मी सरूं क़द दी
उम्र अजे है मर के अग्ग दी
पर नैणां दी गल्ल समझदी
गुमियां जन्म जन्म हन ओए
पर लगदै ज्यों कल दी गल्ल है
इयों लगदै ज्यों अज्ज दी गल्ल है
इयों लगदै ज्यों हुण दी गल्ल है
हुणे ता मेरे कोल खड़ी सी
हुणे ता मेरे कोल नहीं है
इह की छल है इह केही भटकण
सोच मेरी हैरान बड़ी है
नज़र मेरी हर ओंदे जांदे
चेहरे दा रंग फोल रही है
ओस कुड़ी नूं टोल रही है
सांझ ढले बाज़ारां दे जद
मोड़ां ते ख़ुशबू उगदी है
वेहल थकावट बेचैनी जद
चौराहियां ते आ जुड़दी है
रौले लिप्पी तनहाई विच
ओस कुड़ी दी थुड़ खांदी है
ओस कुड़ी दी थुड़ दिसदी है
हर छिन मैंनू इयें लगदा है
हर दिन मैंनू इयों लगदा है
ओस कुड़ी नूं मेरी सौंह है
ओस कुड़ी नूं आपणी सौंह है
ओस कुड़ी नूं सब दी सौंह है
ओस कुड़ी नूं रब्ब दी सौंह है
जे किते पढ़दी सुणदी होवे
जिउंदी जां उह मर रही होवे
इक वारी आ के मिल जावे
वफ़ा मेरी नूं दाग़ न लावे
नई तां मैथों जिया न जांदा
गीत कोई लिखिया न जांदा
इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है।

Tuesday 13 May 2008

भारती अभिधा की तीन कवितायें


स्पर्श

वासना से दग्ध
हाथों ने छुआ जिस पल
मोम सी अहिल्या
पत्थर हुयी उसी पल

स्नेहसिक्त
एक स्पर्श
राम का
फूंक गया पाषाण
देह समझती है
अन्तर स्पर्श का...

स्वप्न

बाँध पोटली
स्वप्नों की
रख लेती हूँ
तकिये के नीचे और
सो जाती हूँ
हर सुबह
काजल केसाथ
डाल लेती हूँ वापस
आंखों में काजल की
लकीरों के भीतर भीतर !


लिफाफे में बादल

एक चंचल बादल का टुकडा
घुस आया था मेरे कमरे में
खिड़की खुली रह गयी थी शायद
उसे लिफाफे में बंद कर
तुम्हे भेज दिया था

क्या वो मिला तुम्हे?
क्या वो बरसा ?
क्या तुम भीगे उस बौछार में?
कवयित्री का पहला काव्य संग्रह 'चाँद खिड़की से ' जयपुर के लोकायत प्रकाशन से इसी साल आया है ,भारती का जन्म और शिक्षा दिल्ली में हुई ,जयपुर से गहरा और लंबा जुडाव,कविता और कला में समान रूचि , सम्प्रति वे दो बेटों के साथ केलिफोर्निया यू एस ए में रहती हैं ।