Saturday 21 March 2009

उदयपुर में सत्यनारायण पटेल का कहानी पाठ



उदयपुर ।``कहां है आदमी, यहां तो सब कीड़े-मकोड़े है। इनकी औलादें भी ऐसी ही होंगी। कभी नहीं, कभी पनही नहीं पहनेंगे। जिनगीभर उबाणे पगे पटेलों की जी हुजूरी करेंगे।´´ गांवों में जातीय और आर्थिक शोषण के यथार्थ का जीवन्त चित्र प्रस्तुत करने वाली कहानी `पनही´ पढ़ते चर्चित युवा कथाकार सत्यनारायण पटेल ने अंत में कथा नायक के इस कथन से समाहार किया `अब मेरा मुंह वया देख रहे हो, जाओ टापरे मेंे जो कुछ हो-लाठी, हंसिया लेकर तैयार रहो, पटेलों के छोरे आते ही होंगे और हां, उबाणे पगे मत आजो कोई।´ पटेल की इस कहानी का अंत प्रबल जन प्रतिरोध की अभिव्यक्ति से हुआ है जो अब कैसी भी धौंस को बर्दाश्त नहीं करेगा। जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के जनपद विभाग द्वारा आयोजित इस कहानी पाठ के पश्चात हुई चर्चा में वरिष्ठ कवि नन्द चतुर्वेदी ने कहा कि `पनही´ एक शक्तिशाली कहानी है जो दबे हुए व्यक्ति को वाणी दे सकने वाली चेतना का उद्घाटन करती है। उन्होंने कहा कि इधर का कहानीकार मध्यम वर्ग की चालाकियों से भरा नजर आ रहा है। ऐसे में पटेल की कहानियॉ आश्वस्ति देने वाली हैं कि कई तरह के पटेलों से लड़ रहे लोगों के स्वर देने की सामथ्र्य अभी मौजूद है। नंद बाबू ने ग्लोबलाइजेशन के नये खतरोंं में स्थानीयता की रक्षा को बड़ी चुनौती बताया। वरिष्ठ उपन्यासकार राजेन्द्र मोहन भटनागर ने पटेेल को बधाई दी कि उन्होंने गांव को अपने रचनाकर्म की विषय वस्तु बनाया। उन्होंने कहा कि `पनही´ की सफलता इस बात में है कि यह श्रोताओं को शहर से निकालकर ठेठ गांव में ले जाती है। सुखाड़िया विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के प्रो.आशुतोष मोहन ने इसे छोटे कैनवास के बावजूद सघन कथा बताया जो अपने भीतर औपन्यासिक गुंजाइश रखती है। उन्होंने नायिका पीराक के चित्रण में आई ऐिन्द्रकता को विरल अनुभव बताते हुए कहानी में छिपे अनेक संकेतों की भी व्याख्या की। उर्दू कथाकार डॉ.सर्वतुिन्नसा खान ने कहा कि समकालीन कथा लेखन की एकरसता में जीवन के बहुविध रंगों की छटा गायब हो रही है ऐसे में गांव की कहानी आना खुशगवार है। खान ने कहानी की भाषा को देशज अनुभवों की समृद्ध उपज बताया। राजस्थान विद्यापीठ के सहआचार्य डॉ. मलय पानेरी ने कहा कि सामंतवाद का पहिया स्वत: जाम नहीं होगा अपितु उसके लिए संघर्ष करना होगा। डॉ. पानेरी ने कहानी को ग्रामीण निम्न वर्गीय जीवन का यथार्थ बताया। `बनास´ के संपादक डॉ. पल्लव ने देशज कथा रूप और शोषण की उद्ाम चेष्टा को सत्यनारायण पटेल की कहानियों की मुख्य विशेषता बताया। इससे पहले जनपद विभाग के निदेशक पुरुषोतम शर्मा ने अतिथियों का स्वागत किया और जनपद विभाग की गतिविधियों की जानकारी दी। वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी रामचन्द्र नन्दवाना ने दलित उत्पीड़न के प्रतिरोध के अपने अनुभव सुनाए। अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ समालोचक प्रो. नवल किशोर ने कहा कि भूमंडलीकरण की चकाचौंध में साहित्य में ही जगह बची है जो पूरन और पीराक जैसे दबे कुचले लोगों की बात कर सके। उन्होंने कहा कि अच्छे लेखक की पहचान यह है कि वह बदलते समय को पकडे़ और उसे सार्थक कला रूप दे। उन्होंने सत्यनारायण पटेल की कहानियों को इस चेतना से सम्पन्न बताते हुए कहा कि छोटी छोटी अिस्मताओं के नाम पर बंटने से ज्यादा जरूरी है कि हम बड़ी लड़ाई के लिए तैयार हों। आयोजन में लोककलाविद् डॉ. महेन्द्र भाणावत, डॉ. एल.आर. पटेल, विभा रिश्म, दुर्गेश नन्दवाना, भंवर सेठ, हिम्मत सेठ, अजुZन मंत्री, लक्ष्मीलाल देवड़ा, गणेश लाल बण्डेला सहित बड़ी संख्या में युवा पाठक उपस्थित थे। अंत में विद्यापीठ के सांस्कृतिक सचिव डॉ. लक्ष्मीनारायण नन्दवाना ने आभार व्यक्त किया।
गणेशलाल मीना
१५१ , टैगोर नगर, हिरण मगरी, से. 4, उदयपुर-313 002

Thursday 5 March 2009

रंगों और शब्दों के बीच की आवाजाही का पड़ाव जयपुर


कलम के लिए दुष्यंत द्वारा
यह आलेख दो मार्च को पत्रिका के मध्य प्रदेश संस्करण में प्रकाशित हुआ था

प्रभु जोशी कथाकार बेहतर हैं या अच्छे पेंटर या उम्दा फिल्मकार, ये तय करना बड़ा मुश्किल है पर ये ज़रूर है कि शब्द रंग और दृश्य तीनों से उनका जुड़ाव उन्हें एक सम्पूर्ण कलाकार बनाता है। अट़्ठारहवीं शताब्दी के अंत और उन्नीसवीं शताब्दी के शुरुआती दशक में कला की दुनिया में कुछ ऐसे लोग हुए और एक आन्दोलन खड़ा हुआ कि रंग और शब्द दोनों विधाओं में साथ काम किया, प्रभु भी वहीं खड़े नजऱ आते हैं अरौर वो बेशक वहाँ कद्दावर भी है और अलग भी...महज उपस्थित भर नहीं हैं।इन दिनों जयपुर के जवाहर कला केंद्र में इन्दौर के इस वर्सेटाईल आर्टिस्ट के लैण्ड स्केप अपना जादू बिखेर रहे हैं। वो अमूर्त और यथार्थ के बीेच एक संवाद सेतु बनाते हैं और ये उनके काम में लगातार दिखता है। जब हमने पूछा कि आप तो मूलत: कथाकार है तो बोले भाई शुरुआत तो चित्रों से हुई फिर शब्दों की दुनिया में रहा हूँ..और ये तो आवाजाही है जो चलती रहती है।प्रभु जोशी भारत के उन् विरले कलाकारों में हैं जिनका काम जब जिस विधा में आया सराहा गया है। यहाँ प्रदर्शित उनके चित्र लैण्ड स्केप के जरिये प्रकृति के रूपांतरण की कलात्मक यात्रा है जिस से गुजरना उनकी अंतर्दृष्टि से होते हुए अपने समय और समाज को देखना भी है। प्रभु कहते हैं कि पेंटिंग मेरे लिए तितलियों को पकडऩे जैसा है कभी एक बच्चे की गलती से मर जाती है , जोशी के लैण्ड स्केप पर उत्तराखंड मालवा और राजस्थान पर्यटन स्थलों छाप नज़र आती है.वे लैण्ड स्केप की प्लेसेज अन्पीपुल्ड के रूप में परिभाषित करते हैं, ऐसे स्थान जहां न तो मनुष्य गया है और ना ही कभी जा पायेगा, उनके लैण्ड स्केप गुजरात में आये भूकंप और भोपाल की झील के नजारे भी नज़र आते हैं, उन्होंने दो पेंटिंग्स भगवान् गणेश पर भी बनायी है ,उनके अनुसार जल रंगों में माफी नामे के लिए कोई स्थान नहीं है, ये तो अपमान सरीखा है। ये एक कलात्मक विरोधाभास है जिससे एक कलाकार को गुजरना ही पड़ता है जबकि तैलीय रंगों को वे शतरंज खेलने जैसा मानते हैं, आप एक कदम चलते हैं और घंटो या कई बार दिनों के लिए वहाँ थम से जाते हैं ।प्रभु का काम इसलिए भी अलग खडा नजऱ आता है कि वे लगातार अपने समय से आँख मिलाते हुए आगे बढ़ते हैं चाहे वो उस वक्त चित्र बना रहे हों कहानी लिख रहे हों या कि कोई फिल्म... कला में बाज़ार की उपस्थति को भी वे अलग नज़रिए से देखते हैं। उनका मानना है कि आवारा पूँजी ने कला में नकारात्मक प्रभाव पैदा किये हैं। यही वजह है कि आज जब दो कलाकार मिलते हैं तो क्राफ्ट या कंटेंट की बजाय इस चर्चा में ज्यादा मसरूफ रहते हैं कि फलां की पेंटिंग दस लाख में बिकी और फलां की बीस लाख या दस हज़ार में जबकि कला मूलत बिकने के लिए होती ही नहीं हैं , वो इस बात पर भी अपनी चिंता जताते हैं कि अमूर्तन की आंधी में रियलिस्टिक कहीं हाशिये पर आ गयी है। इन दिनों वे अपने तीन उपन्यासों जो उन्होंने बीस साल के लम्बे वक्फे में लिखे हैं, को अंतिम रूप दे रहे हैं..तो लगता है कि रंगों की दुनिया में उतरकर ये कथाकार खोया नहीं था बस एक अल्प विराम लिया था..ये भी एक बार फिर स्पष्ट होता है कि जब ऐसा लगता है सृजन की दुनिया के लोग कुछ नहीं कर रहे हैं तो मानना चाहिये कि वे चुपचाप किसी बड़े या अलग से काम को अंजाम दे रहे होते हैं अपने प्रशंसकों पाठकों या दर्शकों को चौंकाने के लिए।