Saturday, 21 March 2009

उदयपुर में सत्यनारायण पटेल का कहानी पाठ



उदयपुर ।``कहां है आदमी, यहां तो सब कीड़े-मकोड़े है। इनकी औलादें भी ऐसी ही होंगी। कभी नहीं, कभी पनही नहीं पहनेंगे। जिनगीभर उबाणे पगे पटेलों की जी हुजूरी करेंगे।´´ गांवों में जातीय और आर्थिक शोषण के यथार्थ का जीवन्त चित्र प्रस्तुत करने वाली कहानी `पनही´ पढ़ते चर्चित युवा कथाकार सत्यनारायण पटेल ने अंत में कथा नायक के इस कथन से समाहार किया `अब मेरा मुंह वया देख रहे हो, जाओ टापरे मेंे जो कुछ हो-लाठी, हंसिया लेकर तैयार रहो, पटेलों के छोरे आते ही होंगे और हां, उबाणे पगे मत आजो कोई।´ पटेल की इस कहानी का अंत प्रबल जन प्रतिरोध की अभिव्यक्ति से हुआ है जो अब कैसी भी धौंस को बर्दाश्त नहीं करेगा। जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के जनपद विभाग द्वारा आयोजित इस कहानी पाठ के पश्चात हुई चर्चा में वरिष्ठ कवि नन्द चतुर्वेदी ने कहा कि `पनही´ एक शक्तिशाली कहानी है जो दबे हुए व्यक्ति को वाणी दे सकने वाली चेतना का उद्घाटन करती है। उन्होंने कहा कि इधर का कहानीकार मध्यम वर्ग की चालाकियों से भरा नजर आ रहा है। ऐसे में पटेल की कहानियॉ आश्वस्ति देने वाली हैं कि कई तरह के पटेलों से लड़ रहे लोगों के स्वर देने की सामथ्र्य अभी मौजूद है। नंद बाबू ने ग्लोबलाइजेशन के नये खतरोंं में स्थानीयता की रक्षा को बड़ी चुनौती बताया। वरिष्ठ उपन्यासकार राजेन्द्र मोहन भटनागर ने पटेेल को बधाई दी कि उन्होंने गांव को अपने रचनाकर्म की विषय वस्तु बनाया। उन्होंने कहा कि `पनही´ की सफलता इस बात में है कि यह श्रोताओं को शहर से निकालकर ठेठ गांव में ले जाती है। सुखाड़िया विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के प्रो.आशुतोष मोहन ने इसे छोटे कैनवास के बावजूद सघन कथा बताया जो अपने भीतर औपन्यासिक गुंजाइश रखती है। उन्होंने नायिका पीराक के चित्रण में आई ऐिन्द्रकता को विरल अनुभव बताते हुए कहानी में छिपे अनेक संकेतों की भी व्याख्या की। उर्दू कथाकार डॉ.सर्वतुिन्नसा खान ने कहा कि समकालीन कथा लेखन की एकरसता में जीवन के बहुविध रंगों की छटा गायब हो रही है ऐसे में गांव की कहानी आना खुशगवार है। खान ने कहानी की भाषा को देशज अनुभवों की समृद्ध उपज बताया। राजस्थान विद्यापीठ के सहआचार्य डॉ. मलय पानेरी ने कहा कि सामंतवाद का पहिया स्वत: जाम नहीं होगा अपितु उसके लिए संघर्ष करना होगा। डॉ. पानेरी ने कहानी को ग्रामीण निम्न वर्गीय जीवन का यथार्थ बताया। `बनास´ के संपादक डॉ. पल्लव ने देशज कथा रूप और शोषण की उद्ाम चेष्टा को सत्यनारायण पटेल की कहानियों की मुख्य विशेषता बताया। इससे पहले जनपद विभाग के निदेशक पुरुषोतम शर्मा ने अतिथियों का स्वागत किया और जनपद विभाग की गतिविधियों की जानकारी दी। वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी रामचन्द्र नन्दवाना ने दलित उत्पीड़न के प्रतिरोध के अपने अनुभव सुनाए। अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ समालोचक प्रो. नवल किशोर ने कहा कि भूमंडलीकरण की चकाचौंध में साहित्य में ही जगह बची है जो पूरन और पीराक जैसे दबे कुचले लोगों की बात कर सके। उन्होंने कहा कि अच्छे लेखक की पहचान यह है कि वह बदलते समय को पकडे़ और उसे सार्थक कला रूप दे। उन्होंने सत्यनारायण पटेल की कहानियों को इस चेतना से सम्पन्न बताते हुए कहा कि छोटी छोटी अिस्मताओं के नाम पर बंटने से ज्यादा जरूरी है कि हम बड़ी लड़ाई के लिए तैयार हों। आयोजन में लोककलाविद् डॉ. महेन्द्र भाणावत, डॉ. एल.आर. पटेल, विभा रिश्म, दुर्गेश नन्दवाना, भंवर सेठ, हिम्मत सेठ, अजुZन मंत्री, लक्ष्मीलाल देवड़ा, गणेश लाल बण्डेला सहित बड़ी संख्या में युवा पाठक उपस्थित थे। अंत में विद्यापीठ के सांस्कृतिक सचिव डॉ. लक्ष्मीनारायण नन्दवाना ने आभार व्यक्त किया।
गणेशलाल मीना
१५१ , टैगोर नगर, हिरण मगरी, से. 4, उदयपुर-313 002

Thursday, 5 March 2009

रंगों और शब्दों के बीच की आवाजाही का पड़ाव जयपुर


कलम के लिए दुष्यंत द्वारा
यह आलेख दो मार्च को पत्रिका के मध्य प्रदेश संस्करण में प्रकाशित हुआ था

प्रभु जोशी कथाकार बेहतर हैं या अच्छे पेंटर या उम्दा फिल्मकार, ये तय करना बड़ा मुश्किल है पर ये ज़रूर है कि शब्द रंग और दृश्य तीनों से उनका जुड़ाव उन्हें एक सम्पूर्ण कलाकार बनाता है। अट़्ठारहवीं शताब्दी के अंत और उन्नीसवीं शताब्दी के शुरुआती दशक में कला की दुनिया में कुछ ऐसे लोग हुए और एक आन्दोलन खड़ा हुआ कि रंग और शब्द दोनों विधाओं में साथ काम किया, प्रभु भी वहीं खड़े नजऱ आते हैं अरौर वो बेशक वहाँ कद्दावर भी है और अलग भी...महज उपस्थित भर नहीं हैं।इन दिनों जयपुर के जवाहर कला केंद्र में इन्दौर के इस वर्सेटाईल आर्टिस्ट के लैण्ड स्केप अपना जादू बिखेर रहे हैं। वो अमूर्त और यथार्थ के बीेच एक संवाद सेतु बनाते हैं और ये उनके काम में लगातार दिखता है। जब हमने पूछा कि आप तो मूलत: कथाकार है तो बोले भाई शुरुआत तो चित्रों से हुई फिर शब्दों की दुनिया में रहा हूँ..और ये तो आवाजाही है जो चलती रहती है।प्रभु जोशी भारत के उन् विरले कलाकारों में हैं जिनका काम जब जिस विधा में आया सराहा गया है। यहाँ प्रदर्शित उनके चित्र लैण्ड स्केप के जरिये प्रकृति के रूपांतरण की कलात्मक यात्रा है जिस से गुजरना उनकी अंतर्दृष्टि से होते हुए अपने समय और समाज को देखना भी है। प्रभु कहते हैं कि पेंटिंग मेरे लिए तितलियों को पकडऩे जैसा है कभी एक बच्चे की गलती से मर जाती है , जोशी के लैण्ड स्केप पर उत्तराखंड मालवा और राजस्थान पर्यटन स्थलों छाप नज़र आती है.वे लैण्ड स्केप की प्लेसेज अन्पीपुल्ड के रूप में परिभाषित करते हैं, ऐसे स्थान जहां न तो मनुष्य गया है और ना ही कभी जा पायेगा, उनके लैण्ड स्केप गुजरात में आये भूकंप और भोपाल की झील के नजारे भी नज़र आते हैं, उन्होंने दो पेंटिंग्स भगवान् गणेश पर भी बनायी है ,उनके अनुसार जल रंगों में माफी नामे के लिए कोई स्थान नहीं है, ये तो अपमान सरीखा है। ये एक कलात्मक विरोधाभास है जिससे एक कलाकार को गुजरना ही पड़ता है जबकि तैलीय रंगों को वे शतरंज खेलने जैसा मानते हैं, आप एक कदम चलते हैं और घंटो या कई बार दिनों के लिए वहाँ थम से जाते हैं ।प्रभु का काम इसलिए भी अलग खडा नजऱ आता है कि वे लगातार अपने समय से आँख मिलाते हुए आगे बढ़ते हैं चाहे वो उस वक्त चित्र बना रहे हों कहानी लिख रहे हों या कि कोई फिल्म... कला में बाज़ार की उपस्थति को भी वे अलग नज़रिए से देखते हैं। उनका मानना है कि आवारा पूँजी ने कला में नकारात्मक प्रभाव पैदा किये हैं। यही वजह है कि आज जब दो कलाकार मिलते हैं तो क्राफ्ट या कंटेंट की बजाय इस चर्चा में ज्यादा मसरूफ रहते हैं कि फलां की पेंटिंग दस लाख में बिकी और फलां की बीस लाख या दस हज़ार में जबकि कला मूलत बिकने के लिए होती ही नहीं हैं , वो इस बात पर भी अपनी चिंता जताते हैं कि अमूर्तन की आंधी में रियलिस्टिक कहीं हाशिये पर आ गयी है। इन दिनों वे अपने तीन उपन्यासों जो उन्होंने बीस साल के लम्बे वक्फे में लिखे हैं, को अंतिम रूप दे रहे हैं..तो लगता है कि रंगों की दुनिया में उतरकर ये कथाकार खोया नहीं था बस एक अल्प विराम लिया था..ये भी एक बार फिर स्पष्ट होता है कि जब ऐसा लगता है सृजन की दुनिया के लोग कुछ नहीं कर रहे हैं तो मानना चाहिये कि वे चुपचाप किसी बड़े या अलग से काम को अंजाम दे रहे होते हैं अपने प्रशंसकों पाठकों या दर्शकों को चौंकाने के लिए।

Tuesday, 3 February 2009

कलम की सहभागिता में जयपुर फ़िल्म फेस्टिवल
















पहला जयपुर इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल
31 जनवरी और एक फरवरी 2009
शिरकत-
मुंबई से जगमोहन मूंधडा,सुभाष कपूर और सुदिप्तो सेन
दिल्ली से दीपक रोय,राकेश अन्दानिया और बीजू मोहन
पंडित विश्वमोहन भट्ट, डॉ हरिराम आचार्य, दीपक पुरोहित, दान सिंह के साथ सारा जयपुर

ख़ास फिल्में -रामचंद पाकिस्तानी, (निर्देशक महरीन जब्बार),

बवंडर (निर्देशक जगमोहन मुंदडा),

लिटिल टेरेरिस्ट ( निर्देशक अश्विन कुमार) ,

अखनूर (निर्देशक सुदिप्तो सेन )


अवार्डस -

नॅशनल इंटर नेशनल

बेस्ट शॉर्ट फ़िल्म- कर्नामोचम( निर्देशक मुरली मनोहर, चेन्नई )

बेस्ट डॉक्युमेंट्री - मुख्तार माई ( निर्देशक बीना सरवर, कराची पाकिस्तान)

जूरी अवार्ड नार्मीन (निर्देशक दीप्ती गोगना, मुंबई)और शेडो चाईल्ड( निर्देशक हेंस हेगे, जर्मनी)


राजस्थान विशेष -

बेस्ट फ़िल्म -ड्राई ( निर्देशक राकेश गोगना )

स्पेशल जूरी -टेक्सचर ऑफ़ अवर सौल ( निर्देशक दीपक गेरा )


क्रिटिक अवार्ड -

लिटिल टेरेरिस्ट ( निर्देशक अश्विन कुमार )और टेक्सचर ऑफ़ अवर सौल ( निर्देशक दीपक गेरा )

Tuesday, 13 January 2009

रेत पर उदयपुर में संगोष्ठी


उदयपुर। पारम्परिकता रेत के शिल्प को शिथिल नहीं कर सकी और जरायमपेशा समाज पर लिखे जाने के बावजूद यह अतिरंजना से बचता है। सुपरिचित आलोचक एवं मीडिया विश्लेषक डॉ. माधव हाड़ा ने भगवानदास मोरवाल के चर्चित उपन्यास रेत के संबंध में कहा कि समाजशास्त्रीयता इस उपन्यास का साहित्येतर मूल्य है। उन्होंने कहा कि अिस्मतावादी आग्रहों से परे होने पर भी रेत की संवेदना हाशिये के समाज से इस तरह संपृक्त है कि उसे अनदेखा करना अनुचित होगा। डॉ. हाड़ा ने किस्सा गोई को उपन्यास के शैल्पिक विन्यास की बड़ी सफलता बताया। साहित्य संस्कृति की विशिष्ट पत्रिका बनास द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी में सुखाड़िया विश्वविद्यालय के डॉ. आशुतोष मोहन ने मोरवाल के तीनों उपन्यासों की चर्चा करते हुए कहा कि हिन्दी उपन्यास अपनी पारम्परिक रूढ़ियों को तोड़कर नया रूप और अर्थवत्ता ग्रहण कर रहा है। डॉ. मोहन ने रेत की तुलना दूसरे अिस्मतावादी उपन्यासों से किए जाने को गैर जरूरी बताते हुए इसकी नायिका रुिक्मणी को एक यादगार चरित्र बताया। संगोष्ठी में जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के सह-आचार्य डॉ. मलय पानेरी ने रेत पर पत्र वाचन किया। डॉ. पानेरी ने मोरवाल की लेखन शैली को प्रेमचन्द की कथा धारा का सबाल्टर्न विस्तार बताते हुए कहा कि यह उपन्यास अपने प्रवाह और सन्देश में विशिष्ट है। बनास के सम्पादक डॉ. पल्लव ने कहा कि चटखारा लेने की प्रवृत्ति उपन्यास को कमजोर बनाती है, मोरवाल की प्रशंसा इस बात के लिए भी की जानी चाहिए कि वे ऐसे आकर्षण में नहीं पड़ते। इससे पूर्व संयोजन कर रहे शोध छात्र गजेन्द्र मीणा ने उपन्यास के कुछ महÙवपूर्ण अंशों का वाचन किया। अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ समालोचक प्रो. नवलकिशोर ने कहा कि रेत हमारे बीच रहने वाले एक कलंकित समुदाय को मानवीय दृष्टि से समझने की संवेदना हमें देता है। उन्होंने रेत की पठनीयता का कारण उसकी कथावस्तु की नवीनता को बताते हुए कहा कि यह हाशिये के बाहर के एक समाज की जन्मना अभिशापित औरत की जीवनचर्या को सामने लाती है। प्रो. नवल किशोर ने उपन्यास और स्त्री विमर्श के दैहिक पक्ष पर भी विस्तृत टिप्पणी की। चर्चा में जन संस्कृति मंच के संयोजक हिमांशु पण्ड्या, आकाशवाणी के कार्यक्रम अधिकारी लक्ष्मण व्यास, शोध छात्र नन्दलाल जोशी सहित अन्य पाठकों ने भी भागीदारी की। अन्त में गणेश लाल मीणा ने सभी का आभार व्यक्त किया।
गणेशलाल मीणा 152, टैगोर नगर, हिरण मगरी से।4, उदयपुर - 313 002 फोन- 9460488529


Thursday, 25 December 2008

रजनीगंधा की महक शब्दों का जादू









रिपोर्ट इमरान शेख
हंसती कभी-कभी है, शायर की डायरी है

जयपुर 24 दिसम्बर
गुलाबीनगरी में पहली बार गुजरात के धनतेज गाँव में जन्मे और फिलहाल वडोदरा से आए मशहूर शायर खलील धनतेजवी ने बुधवार को अपने अशआर और गजलों की प्रस्तुति से कविता और गजल प्रेमियों का दिल जीत लिया। साहित्यिक संस्था रस कलश व जवाहर कला केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में रंगायन सभागार में रजनीगंधा काव्यसंध्या में धनतेजवी ने समाज, उसकी तस्वीर एवं घटनाओं को शायरी में पिरोकर देर तक लोगों को बांधे रखा। उन्होंने श्रोताओं को अपने पुरअसर अशआर सुनाते हुए कहा कि `मैंने जब भी कागज पर शायरी उतारी है, यूं लगा आंधियों की आरती उतारी है...´ इसके बाद उन्होंने दूसरे अंदाज में एक शेर कुछ इस तरह से कहा कि `तू मेरा दोस्त है दो चार कदम आगे चल, तू अगर पीछे चलेगा तो मैं डर जाऊंगा...´ सुनाया तो सभागार वाह-वाह की गूंज से गुजायमान हो उठा।

धनतेजवी ने करीब डेढ घंटे तक शायरी के दौर को जारी रखते हुए कहा `दौलत बंटी तो भाईयों का दिल भी बंट गया, जो पेड़ मेरे हिस्से में आया वो कट गया...´ शेर सुनाकर आज के माहौल पर व्यंग्य किया। इसके बाद उन्होंने बढ़ती हुई महंगाई को भी नहीं बक्शा और कहा कि `अब मैं राशन की कतारों में नज़र आता हूँ।अपने खेतों से बिछड़ने की सज़ा पाता हूँ इतनी महंगाई की बाजार से कुछ लाता हूं, अपने बच्चों में बांटने से घबराता हूं...´ जैसे शेर सुनाकर श्रोताओं से दाद पाई।

इससे पूर्व रजनीगंधा की शुरुआत राजस्थान के वरिठ कवि कृष्ण कल्पित की कविताओं और गीतों से हुई। उन्होंने कहा कि `हंसती कभी-कभी है, हंसती कभी-कभी है, शायर की डायरी है, शायर की डायरी है, रहने दो मुझको तन्हा, रहने दो मुझको तन्हा, यह आखिरी घड़ी है यह आखिरी घड़ी है....´ सुनाकर श्रोताओं से वाह-वाही लूटी। इससे पूर्व उन्होंने `छत्त पर उतरी चांदनी मन में उतरे आप, हम आंखों की झील में उतर गए चुपचाप...´ दोहा सुनाया। उन्होंने अपने मशहूर गीत 'लेखक जी तुम क्या लिखते हो ' और 'राजा रानी बेटा इकलोता, मां से कथा सुनी थी जिसका अंत नहीं होता' सुनाकर महफिल लूट ली।इस अवसर पर शायर कुमार शिव व समारोह अध्यक्ष डॉ। हरिराम आचार्य ने भी गीत गजलों से लोगों की वाह-वाही लूटी। काव्य संध्या के संचालक जाने माने कवि व्यंग्यकार संपत सरल ने सभी का आभार व्यक्त किया।
तस्वीर विनोद शर्मा साभार डेली न्यूज़

Tuesday, 16 December 2008

डॉ. पल्लव को राष्ट्रीय पुरस्कार



चित्तौड़गढ़। युवा लेखक और साहित्य संस्कृति की विशिष्ट पत्रिका `बनास´ के सम्पादक डॉ। पल्लव को भारतीय भाषा परिषद कोलकाता का प्रतििष्ठत `युवा साहित्य पुरस्कार´ देने की घोषणा की गई है। पल्लव को यह राष्ट्रीय पुरस्कार संस्मरण लेखन के लिए मिला है। परिषद की मासिक साहिित्यक पत्रिका `वागर्थ´ में यह संस्मरण प्रकाशित हुआ है। सम्भावना के अध्यक्ष डॉ। के।सी. शर्मा ने बताया कि वर्तमान में जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय, उदयपुर के हिन्दी विभाग में कार्यरत पल्लव समकालीन रचना परिदृश्य में अपनी पहचान बना चुके हैं। उनकी पुस्तक `मीरा : एक पुनमूZल्यांकन´ नयी आलोचना दृष्टि के कारण चर्चा में रही है। भारतीय भाषा परिषद के इस सम्मान के अतिरिक्त उनकी रचनाएं `हंस´, `कथादेश´, `समयान्तर´, `इंडिया टूडे´, समकालीन भारतीय साहित्य´, `वसुधा´, समकालीन जनमत´ सहित अनेक महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।


- डॉ. कनक जैन
कृते सम्भावना, चित्तौड़गढ़फोन : 9413641775

आदिवासी विद्रोह और साहित्य´ विषयक संगोष्ठी




उदयपुर। श्रम, समूह और सहकारिता पर आधारित आदिवासी जीवन का विघटन व्यक्तिगत संपत्ति के उदय से जुड़ा और तभी आदिवासी और गैर आदिवासी समाज में विभाजन भी हुआ। सुप्रसिद्ध मराठी साहित्यकार और अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यकार समिति के राष्ट्रीय महासचिव वाहरू सोनवणे ने उक्त विचार `आदिवासी विद्रोह और साहित्य´ विषयक संगोष्ठी में व्यक्त किए। मानगढ़ में आयोजित इस संगोष्ठी में हरिराम मीणा के उपन्यास `धूणी तपे तीर´ पर चर्चा की गई। सोनवणे ने कहा कि मानगढ़ का नरसंहार भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का गौरव चिन्ह है लेकिन इसका इतिहास में न होना इस बात का परिचायक है कि इतिहासकार भी पूर्वाग्रह से मुक्त नहीं होते।साहित्य संस्कृति की विशिष्ट पत्रिका `बनास´ द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी में राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर के प्रो। रवि श्रीवास्तव ने `धूणी तपे तीर´ को हिन्दी प्रदेश की संघर्षशील जनता की कर्मठता का दस्तावेज बताया। उन्होंने कहा कि आंचलिकता के विपरित नॉन रोमैंटिक मिजाज पूरे उपन्यास में आदिवासी समाज की प्रवंचनाओं के प्रति एक आलोचनात्मक दृष्टि भी रखता है। प्रो. श्रीवास्तव ने इसे औपनिवेशिक व्यवस्था के परिणामस्वरूप अपनी जड़ों से विस्थापित होते आदिवासी जनजीवन के बदलावों और प्रतिरोध की संस्कृति की महागाथा बताया। सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के डॉ. आशुतोष मोहन ने कहा कि पहला गिरमिटिया और जंगल के दावेदार के बीच यह उपन्यास एक नयी श्रेणी की उद्भावना करता है जो इतिहास और साहित्य के बारीक संतुलन को साधने वाली है। गुजरात से आये प्रो. कानजी भाई पटेल ने कहा कि लिखित समाज आदिवासी जीवन और संस्कृति पर मौन रहा है इसी कारण वाचिक परंपराओं में ही इस जीवन के वास्तविक चित्र मिलते हैं। उन्होंने `धूणी तपे तीर´ को इस परंपरा में एक नई शुरुआत बताते हुए कहा कि इतिहास को चुनौती देने के कारण यह उपन्यास सचमुच में महागाथा का रूप ग्रहण कर पाया है। आकाशवाणी उदयपुर के कार्यक्रम अधिकारी लक्ष्मण व्यास ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि टंट्या भील, चोट्टी मुण्डा जैसे आदिवासी नायकों के साथ गोविन्द गुरु का भी महत्वपूर्ण योगदान है लेकिन हिन्दी समाज इस नायक से अपरिचित ही था। उपन्यास के लेखक हरिराम मीणा ने अपनी रचना प्रक्रिया बताते हुए कहा कि मनुष्य के हक की लड़ाई के इतिहास को मनुष्य विरोधी शोषक-शासकों ने दबाया है और उनके आश्रय में पलने वाले इतिहासकारों ने उनका साथ दिया है।अध्यक्षीय उद्बोधन में वरिष्ठ समालोचक प्रो. नवलकिशोर ने कहा कि मुख्यधारा के इतिहास और अनलिखे इतिहास में भेद है। वर्चस्वशाली प्रभुवर्ग ने हाशिए के लोगों की पीड़ा को वह स्थान नहीं दिया जिसके वे हकदार थे। उन्होंने `धूणी तपे तीर´ को इस संदर्भ में उल्लेखनीय कृति बताते हुए कहा कि यथार्थ चित्रण के साथ यह उपन्यास समानान्तर इतिहास लेखन भी करता है। इससे पहले जागरूक युवा संगठन, खेरवाड़ा के सदस्यों द्वारा गोविन्द गुरु के क्रान्ति गीत `नी मानु रे भुरेटिया´ की प्रस्तुति से संगोष्ठी का शुभारम्भ हुआ। आयोजन में अजुZन सिंह पारगी की पुस्तक `स्वामी गोविन्द गुरु : जीवन अने कार्य´ का विमोचन भी किया गया। संचालन कर रहे `बनास´ के सम्पादक डॉ. पल्लव ने अतिथियों का परिचय दिया। आयोजन में मानगढ़ विकास समिति के नाथुरामजी, लखारा आदिवासी सृजन के सम्पादक जितेन्द्र वसावा, जागरूक युवा संगठन के संयोजक डी.एस. पालीवाल, पत्रकार श्याम अश्याम ने भी चर्चा में भागीदारी की। माल्यार्पण और स्मृति चिन्ह `बनास´ के सहयोगी गणेश लाल मीणा ने भेंट की।




- गणेश लाल मीणा152, टैगोर नगर, से। 4, हिरण मगरी, उदयपुर।-313002